आज विश्व हथकरघा दिवस (National Handloom Day) है । जिसे मनाने का मुख्य उद्देश्य है, लघु और मध्यम उद्योग को बढ़ावा देना। यह दिन बुनकर समुदाय को सम्मानित करने के लिए भी मनाया जाता है। इसके साथ भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में उनके योगदान को सराहना इस दिवस (National Handloom Day) का उद्देश्य है। भारत में आज जितने भी बड़ी कंपनियां चल रही हैं, कभी उन्होंने छोटे से घर अपने काम की शुरुआत की थी। एक उद्यमी (National Handloom Day) जब भी कोई कार्य शुरु करता है, तो उनके कार्य के जरिए भारत के आर्थिक विकास में बड़ी भागीदारी मानी जाती है।
7 अगस्त, 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने इस दिन को मनाने की शुरुआत की। तभी से हर साल दिन को मनाया जाता है। इस वर्ष हम 7 अगस्त 2023 को 9वां हैंडलूम-डे (National Handloom Day) मना रहे हैं। हैंडलूम में भारत हमेशा से बहुत प्रतिभावान रहा है। हमारे देश में एक से बढ़कर एक शानदार बुनकर और कारीगार मौजूद हैं, आज भी बड़े-बड़े कलाकारों को जब कोई यूनिक चाहिए होता है तो वो भारत के प्रचीन बुनकरों के समुदायों के पास ही जाना पसंद करते हैं।
लखनऊ
चिकनकारी उत्तर प्रदेश के लखनऊ की प्रसिद्धी है। जो मुख्य रुप से कढाई और कशीदा कारी का रुप है। लखनऊ को ये कला (National Handloom Day) अपनी विरासत में मिली है। लखनऊ नवाबों का शहर रहा है। यहां हर पहने जाने वाला कपड़ा हाथों से तैयार कि गई कारीगारी से सजा होता रहा है। यहां की शिफॉन कपड़े पर चिकनकारी कढ़ाई सबसे ज्यादा पसंद की जाती है।
सूरत
गुजरात का राज्य सूरत अपनी कला (National Handloom Day) के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। प्राचीन समय से सूरत की साड़ियों का वर्णन सुना जा रहा है। जो मुख्य रुप से रेशमी और सूती कपड़ों पर कारीगरी के लिए जाना जाता है। सूरत गुजरात का कपड़ा शहर है। जो किखाब, गाजी और तनचोई जैसी अच्छी गुणवत्ता और बारीक कामों के लिए जाना जाता था।
वाराणसी
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में लगभग 47,213 हथकरघा बुनकर हैं। जो मुख्य रुप से बनारसी साड़ीयां तैयार करते हैं। यह साड़ियाँ बारीक बुने हुए रेशम से बनती हैं और जटिल डिजाइन से सजाई जाती हैं। इन साड़ियों की विशेषता उनके मुगल प्रेरित डिजाइन और जटिल पुष्प और पत्तेदार रुपों में गुथाई है। यहां के बुनकर सोने के काम, कॉम्पैक्ट बुनाई, छोटे विवरण, पैलस, जाल और मीना काम के लिए पहचाने जाते हैं। यहां की रेशम की साड़ियों की चर्चा पूरी दुनिया में होती है। आर्थिक दृष्टी से ये यहां के बुनकर देश की आर्थिक बढ़ोत्तरी में बड़े भागीदार हैं।
चैन्नई
पहले हथकरघा दिवस की शुरुआत चैन्नई से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। पारंपारिक हथकरघा से यदि किसी को खास लगाव है, तो वो चैन्नई में ही मिलती है। नई तकनीकियों का इस्तेमाल कर यहां के कारीगर इन दिनों बड़े क्षेत्र पर काम कर रहे हैं। जिनकी कला में कपड़ों से लेकर सजावटी आइट्म्स में भी संस्कृति का वर्णन नज़र आता है। कांचीपुरम साड़ी यहीं की देन है। इसके साथ ही सूती धागों पर भी यहां के कारीगरों की विशेषता है। चैन्नई आज के समय में एक बड़ा हैडलूम क्षेत्र बन चुका है।
कोटा
राजस्थान का शहर कोटा अपनी कला के लिए जाना जाता है। जो मुख्य रुप से सूती वस्त्र उद्योग पर काम करता है। शाही पारंपरिक कोटा डोरिया यहां की विशेषता है। जिसमें चेक पैटर्न में कपास बुनाई की कला पीढ़ियों से चली आ रही है। चौकोर खाट पैटर्न कोटा डोरी को इसकी विशेष्ट विशेषता देता है। यहां के साड़ियों के बुनकर बहुत प्रसिद्ध है। जिन्हें मसुरियास के नाम से जाना जाता है। जो मैसूर से बुनकरों के पलायन की संभावना से उत्पन्न हुआ। यहां पगड़ी पर बहुत शानदार काम होता है।
इसके अतिरिक्त मध्यप्रदेश की चंदेरी, जयपुर की जयपुरी कढ़ाई। पानीपत का हाथों से तैयार की गई कला। कश्मीर की कश्मीरी कढ़ाई। ये सभी राज्य अपने अंदर एक विशेष कला को रखे हुए हैं। जहां के कारीगर अपनी पीढ़ियों से इस काम को कर रहे हैं। अपने अनुभव और यूनिक सोच के जरिए ही भारत को कला का धनी कहा जाता है।